Uddhava Gita PDF in Hindi | उद्धव-गीता

उद्धव-गीता |  Uddhava Gita in Hindi | Uddhava Gita PDF 


उद्धव गीता: श्रीकृष्ण के अंतिम उपदेशों में छिपा जीवन का गहन रहस्य

उद्धव गीता केवल एक आध्यात्मिक संवाद नहीं, बल्कि जीवन, कर्म, भक्ति, आत्मज्ञान और विवेक का अमूल्य मार्गदर्शन है। इस लेख में उद्धव गीता से प्रेरित एक प्रसिद्ध संवाद के माध्यम से श्रीकृष्ण के विचारों को सरल भाषा में समझने का प्रयास किया गया है। उद्धव गीता आज भी प्रत्येक साधक के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

"उद्धव गीता"  श्रीकृष्ण का वह दिव्य उपदेश जो उन्होंने द्वारका छोड़ने से पहले उद्धव को दिया। जानिए मोक्ष, भक्ति और आत्मज्ञान का परम रहस्य।
श्रीकृष्ण और उद्धव के बीच हुई वह पवित्र वार्ता जो भागवत पुराण का सार है। पढ़िए उद्धव गीता और जीवन का सच्चा अर्थ जानिए। 
श्रीमद भागवद के उन्तीसवें अध्याय उद्धव गीता से विख्यात है | भगवतम के इस भाग को उद्धव गीता के नाम से जाना जाता है। इंद्र और भगवानगण श्री कृष्ण के पास जाते हैं और उनसे वैकुंठ लौटने का अनुरोध करते हैं, उनका स्वर्गीय निवास है। भगवान कृष्ण ने उन्हें आश्वासन दिया कि वह बहुत जल्द दुनिया छोड़कर स्वर्ग लौट जाएंगे । अपने करीबी शिष्य की यह बात सुनकर, उद्धव कृष्ण को अपने साथ ले जाने के लिए कहते हैं। 

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भगवान श्रीकृष्ण फिर उद्धव को प्रवचन देते हैं। संक्षेप में यह भगवद्गीता जैसा ही है। लेकिन एक युद्धक्षेत्र की पृष्ठभूमि के बजाय, जहाँ श्रीकृष्ण अर्जुन से अपने दुश्मनों का सामना अपने कर्तव्य के रूप में करने का आग्रह करते हैं, यहाँ वही दार्शनिक सिद्धांत अधिक सौहार्दपूर्ण वातावरण में समझाए गए हैं।

उद्धव गीता | Uddhava Gita

उद्धव बचपन से ही श्रीकृष्ण की सेवा में रहे, किन्तु उन्होंने श्रीकृष्ण से कभी न तो कोई इच्छा जताई और न ही कोई वरदान माँगा।

जब श्रीकृष्ण अपने अवतार-काल को पूर्ण कर गोलोक जाने को तत्पर हुए, तब उन्होंने उद्धव को अपने पास बुलाया और कहा—

"प्रिय उद्धव! मेरे इस अवतार-काल में अनेक लोगों ने मुझसे वरदान प्राप्त किए, पर तुमने कभी कुछ नहीं माँगा। अब कुछ माँगो, मैं तुम्हें देना चाहता हूँ।

तुम्हारा भला करके मुझे भी संतुष्टि होगी।"

उद्धव ने इसके बाद भी स्वयं के लिए कुछ नहीं माँगा। वे तो केवल उन शंकाओं का समाधान चाहते थे, जो उनके मन में श्रीकृष्ण की शिक्षाओं और उनके कृतित्व को देखकर उठ रही थीं।

उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा—

"भगवन्! महाभारत के घटनाक्रम में अनेक बातें मैं नहीं समझ पाया।

आपके उपदेश अलग रहे, जबकि आपका व्यक्तिगत जीवन कुछ अलग दिखाई देता रहा। क्या आप मुझे इसका कारण समझाकर मेरी ज्ञान-पिपासा को शांत करेंगे?"

श्रीकृष्ण बोले—

"आज जो कुछ तुम जानना चाहते हो और उसका मैं जो तुम्हें उत्तर दूँगा, वह 'उद्धव-गीता' के रूप में जानी जाएगी। इसी कारण मैंने तुम्हें यह अवसर दिया है। तुम बेझिझक पूछो।

उद्धव! मैंने कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में अर्जुन से जो कुछ कहा, वह 'भगवद्गीता' थी।"

उद्धव ने पूछना शुरू किया—

"हे कृष्ण! सबसे पहले मुझे यह बताइए कि सच्चा मित्र कौन होता है?"

श्रीकृष्ण ने कहा—

"सच्चा मित्र वह है, जो ज़रूरत पड़ने पर मित्र की बिना कुछ माँगे सहायता करे।"

उद्धव—

"कृष्ण! आप पांडवों के आत्मीय प्रिय मित्र थे। आपद्-बांधव के रूप में उन्होंने सदा आप पर पूरा भरोसा किया। कृष्ण! आप महान ज्ञानी हैं। आप भूत, वर्तमान और भविष्य के ज्ञाता हैं।

किन्तु आपने सच्चे मित्र की जो परिभाषा दी है, तो आपको नहीं लगता कि आपने उस परिभाषा के अनुसार कार्य नहीं किया?

आपने धर्मराज युधिष्ठिर को द्यूत (जुआ) खेलने से रोका क्यों नहीं?

चलो, ठीक है कि आपने उन्हें नहीं रोका, लेकिन आपने भाग्य को भी धर्मराज के पक्ष में नहीं मोड़ा।

आप चाहते तो युधिष्ठिर को जिता सकते थे।

आप कम-से-कम उन्हें धन, राज्य और यहाँ तक कि स्वयं को हारने के बाद तो रोक सकते थे।

उसके बाद जब उन्होंने अपने भाइयों को दाँव पर लगाना शुरू किया, तब तो आप सभाकक्ष में पहुँच सकते थे। आपने वह भी नहीं किया।

उसके बाद जब दुर्योधन ने पांडवों को सदैव अच्छी किस्मत वाला बताते हुए द्रौपदी को दाँव पर लगाने के लिए प्रेरित किया और जीतने पर हारा हुआ सब कुछ वापस कर देने का लालच दिया, कम-से-कम तब तो आप हस्तक्षेप कर ही सकते थे।

अपनी दिव्य शक्ति के द्वारा आप पासों को धर्मराज के अनुकूल कर सकते थे।

इसके स्थान पर आपने तब हस्तक्षेप किया, जब द्रौपदी लगभग अपना शील खो रही थी। तब आपने उसे वस्त्र देकर द्रौपदी के शील की रक्षा करने का दावा किया।

लेकिन आप यह दावा भी कैसे कर सकते हैं?

उसे एक आदमी घसीटकर सभा में लाता है और इतने सारे लोगों के सामने निर्वस्त्र करने के लिए छोड़ देता है।

एक महिला का शील क्या बचा? आपने क्या बचाया?

अगर आपने संकट के समय अपने लोगों की मदद नहीं की, तो आपको आपद्-बांधव कैसे कहा जा सकता है?

बताइए, आपने संकट के समय मदद नहीं की, तो फिर उसका क्या लाभ?

क्या यही धर्म है?"

इन प्रश्नों को पूछते-पूछते उद्धव का गला रुंध गया और उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।

ये अकेले उद्धव के प्रश्न नहीं हैं। महाभारत पढ़ते समय हर एक के मनोमस्तिष्क में ये सवाल उठते हैं।

उद्धव ने हम लोगों की ओर से ही श्रीकृष्ण से उक्त प्रश्न किए।

भगवान श्रीकृष्ण मुस्कुराते हुए बोले—

"प्रिय उद्धव, यह सृष्टि का नियम है कि विवेकवान ही जीतता है।

उस समय दुर्योधन के पास विवेक था, धर्मराज के पास नहीं।

यही कारण रहा कि धर्मराज पराजित हुए।"

उद्धव को हैरान-परेशान देखकर श्रीकृष्ण आगे बोले—

"दुर्योधन के पास जुआ खेलने के लिए पैसा और धन तो बहुत था, लेकिन उसे पासों का खेल खेलना नहीं आता था, इसलिए उसने अपने मामा शकुनि का द्यूत-क्रीड़ा के लिए उपयोग किया। यही विवेक है।

धर्मराज भी इसी प्रकार सोच सकते थे और अपने चचेरे भाई से पेशकश कर सकते थे कि उनकी तरफ से मैं खेलूँगा। ज़रा विचार करो कि अगर शकुनि और मैं खेलते, तो कौन जीतता?

पासे के अंक उसके अनुसार आते या मेरे अनुसार?

चलो, इस बात को जाने दो। उन्होंने मुझे खेल में शामिल नहीं किया, इस बात के लिए उन्हें माफ़ किया जा सकता है। लेकिन...

उन्होंने विवेक-शून्यता से एक और बड़ी गलती की।

और वह यह कि उन्होंने मुझसे प्रार्थना की कि मैं तब तक सभा-कक्ष में न आऊँ, जब तक कि मुझे बुलाया न जाए।

क्योंकि वे अपने दुर्भाग्य से खेल मुझसे छिपकर खेलना चाहते थे।

वे नहीं चाहते थे कि मुझे मालूम पड़े कि वे जुआ खेल रहे हैं।

इस प्रकार उन्होंने मुझे अपनी प्रार्थना से बाँध दिया।

मुझे सभा-कक्ष में आने की अनुमति नहीं थी।

इसके बाद भी मैं कक्ष के बाहर इंतज़ार कर रहा था कि कब कोई मुझे बुलाता है।

भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव सब मुझे भूल गए।

बस अपने भाग्य और दुर्योधन को कोसते रहे।

अपने भाई के आदेश पर जब दुःशासन द्रौपदी को बाल पकड़कर घसीटता हुआ सभा-कक्ष में लाया, द्रौपदी अपनी सामर्थ्य के अनुसार जूझती रही।

तब भी उसने मुझे नहीं पुकारा।

उसकी बुद्धि तब जागृत हुई, जब दुःशासन ने उसे निर्वस्त्र करना प्रारंभ किया।

जब उसने स्वयं पर निर्भरता छोड़कर—

'हरी, हरी! अभयं कृष्ण! अभयं!'

की गुहार लगाई, तब मुझे उसके शील की रक्षा का अवसर मिला।

जैसे ही मुझे पुकारा गया, मैं अविलंब पहुँच गया।

अब इस स्थिति में मेरी गलती बताओ?"

उद्धव बोले—

"कान्हा, आपका स्पष्टीकरण प्रभावशाली अवश्य है, किन्तु मुझे पूर्ण संतुष्टि नहीं हुई।

क्या मैं एक और प्रश्न पूछ सकता हूँ?"

श्रीकृष्ण की अनुमति से उद्धव ने पूछा—

"इसका अर्थ यह हुआ कि आप तभी आओगे, जब आपको बुलाया जाएगा?

क्या संकट से घिरे अपने भक्त की मदद करने आप स्वतः नहीं आओगे?"

श्रीकृष्ण मुस्कराए और बोले—

"उद्धव, इस सृष्टि में हरेक का जीवन उसके स्वयं के कर्मफल के आधार पर संचालित होता है।

न तो मैं इसे चलाता हूँ और न ही इसमें कोई हस्तक्षेप करता हूँ।

मैं केवल एक 'साक्षी' हूँ।

मैं सदैव तुम्हारे नज़दीक रहकर जो हो रहा है, उसे देखता हूँ।

यही ईश्वर का धर्म है।"

"वाह-वाह! बहुत अच्छा, श्रीकृष्ण!

तो इसका अर्थ यह हुआ कि आप हमारे नज़दीक खड़े रहकर हमारे सभी दुष्कर्मों का निरीक्षण करते रहेंगे?

हम पाप पर पाप करते रहेंगे और आप साक्षी बनकर हमें देखते रहेंगे?

आप क्या चाहते हैं कि हम भूल करते रहें?

पाप की गठरी बाँधते रहें और उसका फल भुगतते रहें?"

उलाहना देते हुए उद्धव ने पूछा।

तब श्रीकृष्ण बोले—

"उद्धव, तुम शब्दों के गहरे अर्थ को समझो।

जब तुम समझकर अनुभव कर लोगे कि मैं तुम्हारे नज़दीक साक्षी के रूप में हर पल हूँ, तो क्या तुम कुछ भी गलत या बुरा कर सकोगे?

तुम निश्चित रूप से कुछ भी बुरा नहीं कर सकोगे।

जब तुम यह भूल जाते हो और यह समझने लगते हो कि मुझसे छिपकर कुछ भी कर सकते हो, तभी तुम मुसीबत में फँसते हो।

धर्मराज का अज्ञान यह था कि उसने माना कि वह मेरी जानकारी के बिना जुआ खेल सकता है।

अगर उसने यह समझ लिया होता कि मैं प्रत्येक के साथ हर समय साक्षी रूप में उपस्थित हूँ, तो क्या खेल का रूप कुछ और नहीं होता?"

भक्ति से अभिभूत उद्धव मंत्रमुग्ध हो गए और बोले—

"प्रभु! कितना गहरा दर्शन है। कितना महान सत्य।

प्रार्थना और पूजा-पाठ से ईश्वर को अपनी मदद के लिए बुलाना तो महज़ हमारी 'पर-भावना' है।

मगर जैसे ही हम यह अनुभव करना शुरू करते हैं कि ईश्वर की मर्ज़ी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता, तब हमें साक्षी के रूप में उनकी उपस्थिति महसूस होने लगती है।

गड़बड़ तब होती है, जब हम इसे भूलकर दुनियादारी में डूब जाते हैं।

संपूर्ण श्रीमद्भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को इसी जीवन-दर्शन का ज्ञान दिया है।

सारथी का अर्थ है—मार्गदर्शक।

अर्जुन के लिए सारथी बने श्रीकृष्ण वस्तुतः उसके मार्गदर्शक थे।

वह स्वयं की सामर्थ्य से युद्ध नहीं कर पा रहा था, लेकिन जैसे ही अर्जुन को परम साक्षी के रूप में भगवान श्रीकृष्ण का एहसास हुआ, वह ईश्वर की चेतना में विलय हो गया।

यह अनुभूति थी—शुद्ध, पवित्र, प्रेममय, आनंदित, सुप्रीम चेतना की।

इन्द्रिय-निग्रह : उद्धव गीता का द्वितीय उपदेश

उद्धव गीता का दूसरा महत्त्वपूर्ण उपदेश है—इन्द्रियों पर संयम। श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि हमारी इन्द्रियाँ इच्छाओं को निरंतर पोषित करती हैं और मनुष्य को माया के भँवर में उलझाए रखती हैं।

इसी संदर्भ में वे कहते हैं—

तस्माद्युक्तेन्द्रियग्रामो युक्तचित्त इदं जगत्।
आत्मनीक्षस्व विततमात्मानं मय्यधीश्वरे।।

अर्थात्—

"इन्द्रियों को साधो, चित्त को स्थिर करो, और इस समस्त जगत् में सर्वत्र व्याप्त उस परमात्मा को—जो मुझ ईश्वर में समाया है—अपनी आत्मा में देखो।" (उद्धव गीता, 2.9)

यहाँ श्रीकृष्ण योग के मर्म को उद्घाटित करते हैं। महर्षि पतंजलि ने भी यही कहा है—

"योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः"

अर्थात् चित्त की वृत्तियों का निरोध ही योग है।

श्रीकृष्ण इसी सत्य को आगे ले जाते हुए कहते हैं कि जब तक इन्द्रियाँ अनुशासित नहीं होतीं, तब तक न मन शांत होता है और न आत्मा को उसके वास्तविक स्वरूप का बोध होता है।

इन्द्रिय-संयम केवल त्याग नहीं, बल्कि भीतर की ओर मुड़ने की वह पहली सीढ़ी है, जो साधक को स्वयं से और परमात्मा से जोड़ती है।

तत-त्वम-असि !
अर्थात वह तुम ही हो।

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1 Comments

  1. उद्धव गीता नाम से परिचित थी पर उसे पढ़ने का अवसर प्राप्त नही हुआ था।यहां अत्यंत सरल भाषा मे उसका अर्थ पढकर बहुत अच्छा लगा। हमलोग अनजाने मे ही अपने धरोहर से इतने दूर हो चुके है कि अपने ही देश मे विदेशियो की तरह हो चुके।इसे इतनी सहजता से उपलब्ध कराने के लिए हृदय से आभार।

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