क्या मूर्ति में भगवान का वास सच में होता है?
यह सवाल बहुत पुराना है। और शायद आपके मन में भी कभी न कभी यह ख्याल आया होगा ,क्या सच में मूर्ति में भगवान रहते हैं? या यह सिर्फ पत्थर और धातु का एक टुकड़ा है? आइए आज इस विषय को बहुत ही सरल भाषा में समझने की कोशिश करते हैं।
मूर्ति पूजा क्या है?
मूर्ति पूजा यानी किसी देवी-देवता की प्रतिमा के सामने श्रद्धा से खड़े होना, उन्हें फूल-माला चढ़ाना, दीपक जलाना और मन से प्रार्थना करना। भारत में यह परंपरा हजारों सालों से चली आ रही है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या यह सिर्फ एक परंपरा है? या इसके पीछे कोई गहरा सत्य छुपा है?
पत्थर में भगवान? यह कैसे संभव है?
बहुत से लोग कहते हैं "भगवान तो हर जगह हैं, फिर मूर्ति में अलग से क्यों ढूंढना?" यह बात सही भी है। लेकिन मूर्ति पूजा का असली मतलब यह नहीं है कि भगवान सिर्फ उस पत्थर में बंद हैं।
असल में मूर्ति एक माध्यम है। जैसे आप किसी दूर के दोस्त से फोन पर बात करते हैं फोन खुद दोस्त नहीं है, लेकिन उससे कनेक्शन जरूर होता है। ठीक उसी तरह मूर्ति भी भगवान से जोड़ने का एक जरिया है।
हिंदू शास्त्रों में मूर्ति पूजा का क्या कहना है?
वेद, पुराण और आगम शास्त्र इन सभी में मूर्ति पूजा का उल्लेख है। आगम शास्त्र तो खासतौर पर मंदिर निर्माण और मूर्ति स्थापना के नियम बताते हैं।
शास्त्रों के अनुसार जब किसी मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा होती है यानी विधि-विधान से उसमें प्राण फूंके जाते हैं तो उस मूर्ति में दैवीय शक्ति का संचार होता है। यह कोई अंधविश्वास नहीं, बल्कि एक गहरी आध्यात्मिक प्रक्रिया है।
प्राण प्रतिष्ठा क्या होती है?
प्राण प्रतिष्ठा एक विशेष धार्मिक अनुष्ठान है। इसमें पंडित और विद्वान मंत्रों के जरिए देवता का आह्वान करते हैं। मूर्ति को स्नान कराया जाता है, वस्त्र पहनाए जाते हैं, और विशेष मंत्रों से उसमें दिव्य ऊर्जा का आवाहन किया जाता है।
इसके बाद वह मूर्ति सिर्फ पत्थर नहीं रहती वह देवता का प्रतीक और उनकी उपस्थिति का स्थान बन जाती है।
विज्ञान की नजर से देखें तो?
अब बात करते हैं विज्ञान की। कई वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं ने माना है कि मंत्रों की ध्वनि और सामूहिक विश्वास की शक्ति किसी भी स्थान की ऊर्जा को बदल सकती है।
मंदिरों में नियमित रूप से होने वाली पूजा, घंटे की आवाज, धूप-दीप और भजन-कीर्तन ये सब मिलकर एक खास तरह का ऊर्जा क्षेत्र बनाते हैं। इसे आप पॉजिटिव एनर्जी कह सकते हैं। और जब कोई उस माहौल में बैठकर ध्यान करता है तो उसे सच में शांति मिलती है।
मूर्ति पूजा की जरूरत क्यों पड़ी?
सोचिए अगर कोई आपसे कहे कि "हवा में किसी अनदेखी शक्ति को याद करो और उससे प्रेम करो" तो यह कितना मुश्किल होगा?
इंसान का मन बहुत चंचल है। उसे एकाग्र होने के लिए किसी रूप, किसी चेहरे, किसी आकार की जरूरत होती है। मूर्ति उसी जरूरत को पूरा करती है।
- बच्चा भगवान को देखकर उन्हें पहचानता है
- मन को एक केंद्र बिंदु मिलता है
- भावनाएं व्यक्त करने का एक रूप मिलता है
- प्रेम और श्रद्धा एक दिशा पाती है
इसीलिए हमारे पूर्वजों ने मूर्ति पूजा की परंपरा शुरू की — ताकि आम इंसान भी भगवान से जुड़ सके।
क्या हर मूर्ति में भगवान होते हैं?
यह सवाल बहुत जरूरी है। घर में रखी हर मूर्ति और मंदिर की प्राण प्रतिष्ठित मूर्ति में फर्क होता है।
हां, घर की मूर्ति के सामने भी आप दिल से प्रार्थना कर सकते हैं और भगवान आपकी सुनते हैं क्योंकि भावना सबसे बड़ी होती है। लेकिन विधिवत प्राण प्रतिष्ठित मूर्ति में वह दिव्य ऊर्जा अधिक प्रबल मानी जाती है।
भक्त की भावना सबसे बड़ी होती है
एक बात और याद रखिए भगवान भाव के भूखे हैं, भोग के नहीं। अगर आप सच्चे दिल से किसी साधारण मूर्ति के सामने भी बैठें, तो भगवान वहां जरूर होते हैं। क्योंकि भगवान हर जगह हैं और आपके हृदय में सबसे ज्यादा।
मूर्ति पूजा के फायदे क्या हैं?
- मन को शांति मिलती है :पूजा करने से तनाव कम होता है
- एकाग्रता बढ़ती है :मूर्ति को देखकर ध्यान लगाना आसान होता है
- सकारात्मक सोच आती है :नियमित पूजा से जीवन में अनुशासन आता है
- परिवार में एकता बनती है : एक साथ पूजा करने से प्रेम बढ़ता है
- आत्मविश्वास मजबूत होता है :भगवान पर भरोसा रखने से हिम्मत मिलती है
आलोचकों का क्या कहना है?
कुछ लोग कहते हैं कि मूर्ति पूजा अंधविश्वास है। वे पूछते हैं "अगर भगवान सर्वशक्तिमान हैं, तो क्या उन्हें पत्थर में बंद करना सही है?"
इस पर हमारा जवाब यह है कोई भक्त भगवान को बंद नहीं करता। वह तो बस एक झरोखा खोलता है, जिससे भगवान की झलक मिल सके। मूर्ति एक द्वार है मंजिल नहीं।
निष्कर्ष !!तो क्या सच में मूर्ति में भगवान होते हैं?
हां और नहीं दोनों। भगवान किसी एक मूर्ति में सीमित नहीं हैं, लेकिन एक सच्चे भक्त की नजर में हर मूर्ति में भगवान हैं।
जब आप श्रद्धा से हाथ जोड़ते हैं, जब आंखें बंद करके मन से पुकारते हैं उस पल भगवान वहां होते हैं। मूर्ति वह माध्यम है जो आपको उस अनुभव तक पहुंचाती है।
तो अगली बार जब आप मंदिर जाएं और मूर्ति के सामने खड़े हों तो याद रखें, भगवान उस पत्थर में नहीं, आपकी श्रद्धा में हैं। और वह श्रद्धा ही असली पूजा है।
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